लॉकडाउन डायरी – दूरियाँ बड़ा सता गई.. 

१९ मार्च २०२०, प्रधानमंत्री जी के राष्ट्र के नाम संबोधन के साथ ही अपने देश में भी कोरोना की दस्तक हो जाने की बात एक आम आदमी तक पहुंची . कोविड-१९ महामारी अपने देश में भी पैर फैला चुकी थी और सरकार ने जो सही समझे वो कदम उठाने शुरू कर दिए थे. पहले कुछ घंटो के जनता कर्फ़्यू का ऐलान हुआ और काफी हद तक उसका असर भी दिखा. ये जनता कर्फ़्यू उस लॉकडाउन का आग़ाज़ था जिसे आगे चलकर चार चरणों में ७० दिनों के लिए बढ़ा दिया गया और जिसने हर एक आदमी की जिंदगी को किसी न किसी तरह के बदल दिया. इस लॉकडाउन के बीच कितनी ही कहानियाँ बनी, बिगड़ी, और कुछ हमेशा के लिए खत्म हो गई. कई ऐसी भी कहानियाँ है जो उतार चढ़ाव को झेलते अभी भी चल रही हैं.

ऐसी ही एक कहानी हैं साठ पार चुके सलूजा दम्पति की. 


मिस्टर और मिसेज सलूजा दोनों ही लखनऊ की एक पॉश कॉलोनी में अपने बड़े से घर में रहते हैं. दोनों ने ही सारी उम्र सरकारी नौकरी की और फिर रिटायर होने के बाद एक खुली कॉलोनी में घर बनवा कर रहने लगे. दोनों की जिंदगी में हर तरह की सहूलतें थी. पैसो की कोई कमी ना होने से वो बिना किसी तकलीफ के अपने दिन गुजार रहे थे. हाँ, फिर भी जो कमी थी, या यूँ कहे उन्हें जिस बात का अपराधबोध था वो था बच्चो से दूर रहना. एक बेटी और एक बेटे के माता पिता, सलूजा दम्पति ताउम्र नौकरी करते रहे. और इसकी वजह से उनके बच्चे बोर्डिंग स्कूल में रहे. उन्हें लगा ये बच्चो के अच्छे भविष्य के लिए एक सही कदम था. पर दोनों ही बच्चे अपने बचपन के नज़रअंदाज होने के लिए अपने माता पिता को ही दोषी ठहराते रहे. सलूजा दम्पति चाहते थे कि पढाई पूरी करने के बाद बच्चे उनके पास रहें पर दोनों बच्चों को ये मंज़ूर नहीं हुआ. बेटा विदेश में बस गया और बेटी दूसरे शहर में!

लॉकडाउन से पहले तक सलूजा दम्पति अपने अपने तरीको से खुद को सारा दिन व्यस्त रखते थे. मिस्टर सलूजा कई क्लब्स के मेंबर थे. हर शाम वो अपने उम्र वाले कॉलोनी के और लोगो के साथ पार्क में कई घंटे बिताते थे. वही मिसेज सलूजा घर के थोड़े बहुत काम देखती और फिर घर के अगल बगल रहने वाली अपनी सखियों के साथ हंसी मज़ाक में दिन निकाल देती. अपने अपने घरो के काम खत्म करके सभी सखिया मिसेज सलूजा के घर के बरामदे में चौपाल सी लगाती और फिर शाम तक उनके घर में रौनक रहती. 

फिर लॉकडाउन का ऐलान हो गया और सब बंद हो गया. कोरोना वायरस का कहर कम होने का नाम नहीं ले रहा था इसलिए लोगो ने भी खुद को घरो में कैद कर लिया. जहाँ देश में एक बड़ा वर्ग ऐसा भी था जिसके सामने कुछ दिनों के लॉकडाउन से ही रोज़ी-रोटी का संकट आ खड़ा हो गया, सलूजा दम्पति की परेशानी दूसरी थी. सारा दिन घर में बंद वो अकेलेपन के शिकार होने लगे. घर के सारे काम खुद करने की वजह से मिसेस सलूजा बीमार भी रहने लगी. वैसे तो पहले से ही सलूजा दम्पति की दवाऐं चल ही रही थीं बुढ़ापे में होने वाली बीमारियों की. पर लॉकडाउन में उन्हें वो दवा नहीं मिल पा रही थी जो उनके लिए सबसे ज्यादा असर करने वाली थी; लोगो का साथ जिनसे वो अपनी बातें साझा करते थे.

उनके बच्चो ने भी अपनी जिम्मेदारियां निभाते हुए उनके लिए हर वो सामान ऑनलाइन भेज दिआ जो जरुरी कहा गया था. मास्क, सैनिटाइज़र, दवाओं के साथ ऑनलाइन राशन भी. पर उन्हें जो चाहिए था वो था सामाजिक निकटता, लोगो का साथ और उनका हौसला बढ़ाने वाली बातें करने वाले वो लोग जिनसे साथ वो रोज खुद को व्यस्त रख रहे थे. सलूजा दम्पति हर दिन भावात्मक रूप से थोड़े और कमज़ोर होते जा रहे थे. मिस्टर सलूजा सुबह की सैर और शाम को पार्क में होने वाली चर्चाओं की कमी सबसे ज्यादा महसूस कर रहे थे. वही मिसेज सलूजा, अपनी मोहल्ले की सखियों के साथ होने वाली रोज की हंसी मज़ाक को. वो दोनों एक दूसरे का सहारा बनने की पूरी कोशिश कर रहे थे पर घर में बंद रहना उनके लिए उनके लिए वैसा ही था जैसे पिंजरे का पंछी. सुविधाए तो सारी थी लगभग, पर मन नहीं लग रहा था. मिस्टर सलूजा मिसेज सलूजा की बिगड़ती तबियत को देखते हुए कभी- कभी काफी परेशान हो जाते कि क्या इस लॉकडाउन में ही वो उनका साथ छोड़ जाएगी! वही मिसेज सलूजा को इस बात का डर ज्यादा था कि कही उन दोनों को कोरोना ना हो जाए और वो अपने बच्चो से मिले बिना ही दुनिया से चले जाए! जैसे तैसे एक एक दिन गुजारते वो दोनों बस लॉकडाउन के खत्म होने का इंतज़ार करते रहते.


कोविड-१९ महामारी अपने साथ वरिष्ठ नागरिकों के लिए एक अलग तरह की समस्या लेकर आई है. जहाँ वो बीमारी के जल्दी शिकार होने वाले लोगो में से तो हैं ही, उनके बीमारी को हरा पाने के भी हालात कम भी ही हैं. पर वरिष्ठ नागरिकों के लिए ये ही दो कारण नहीं हैं परेशान होने के. लॉकडाउन के चलते वो अकेलेपन के शिकार ज्यादा हुए. शारीरिक रूप से कोई काम ना कर पाने से उनके लिए ये रोक ज्यादा निराश करने वाली थी कि वो बाहर नहीं जा सकते. उम्र के इस पड़ाव पर उनके लिए लॉकडाउन और सोशल डिस्टैन्सिंग एक नई बीमारी सी साबित हुई. एक स्टडी के हिसाब से

  • ७८ फीसदी बुजुर्गों को राष्ट्रीय स्तर पर आवश्यक वस्तुओं और सेवाओं तक पहुंचने में चुनौतियों का सामना करना पड़ा.

  • ६० प्रतिशत उत्तरदाताओं ने बंद के दौरान अपने घरों में सीमित और सामाजिक रूप से अलग-थलग महसूस किया.

  • वही ६५ फीसदी बुजुर्ग ऐसे है जिनकी आजीविका प्रभावित हुई. इनमें से ६१ फीसदी ग्रामीण इलाकों से थे, जबकि ३९ फीसदी शहरी इलाकों से थे.

खैर, कोरोना का खतरा को खत्म नहीं हुआ पर लॉकडाउन खत्म हो गया. सलूजा दम्पति की परेशानी थोड़ी ही सही पर कम हुई हैं. अब मिस्टर सलूजा सोशल डिस्टैन्सिंग का ध्यान रखते हुए सैर पर जाने लगे हैं. मिसेज सलूजा की भी सखियाँ रोज तो नहीं , पर कभी कभी दूर से ही आपस में दुःख सुख साझा करने लगी हैं. घर में अभी भी सारा कम मिसेज सलूजा को करना पड़ रहा हैं पर अब मिस्टर सलूजा भी उनकी मदद करने लगे हैं. हर शाम जब मिसेज सलूजा पौधों में पानी देती हैं तो उनके किचेन से मिस्टर सलूजा की आवाज आती हैं ” रेखा, चाय बन गई, आ जाओ..” ये भी किसी आई लव यू से कम नहीं हैं, मिसेज़ सलूजा के चेहरे की मुस्कान ये बता देती है. उनकी परेशानियां कम हो रहीं हैं और वो बेहतर दिनों की उम्मीद में जिये जा रहे हैं, कुछ हद तक पहले जैसे ही!

“I’m taking my blog to the next level with Blogchatter’s My Friend Alexa.”

27 Comments

  1. सच कहा लॉक डाउन में अकेलेपन को बढ़ा दिया.
    मेरी माँ अकेली रहती है और ये पढ़ के बीते छह महीने उन्होंने कैसे निकले होंगे समझ सकती हूँ.
    उनका दिन में चार बार मुझे फ़ोन करना, बच्चो से बात करने की जिद्द करना, आसान नहीं होता घर की अंदर बैठ जाना.
    ये साबित करता है इंसान एक सामाजिक प्राणी है और दूरियों के बढ़ने से अकेलापन और गहराता है

    पसंद करें

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